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शासन के आदेश को ठेंगा, सहसपुर लोहारा में नियमों की खुलेआम हत्या! तकनीकी सहायक से उपयंत्री का काम लेकर मनरेगा व्यवस्था को बनाया मजाक

राज्य मनरेगा परिषद और जिला पंचायत के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी नहीं रुकी मनमानी, अब उठ रहा बड़ा सवाल—शासन बड़ा या प्रभारी सीईओ

कवर्धा। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत संविदा एवं मानदेय अधिकारियों-कर्मचारियों से योजना के अतिरिक्त अन्य कार्य नहीं लिए जाने के शासन के स्पष्ट आदेशों के बावजूद कबीरधाम जिले के जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा में नियमों की खुलेआम अनदेखी का मामला सामने आया है। शिकायत के बाद राज्य मनरेगा परिषद, जिला पंचायत और उच्च अधिकारियों तक पूरा मामला पहुंचा, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यवस्था जस की तस बनी हुई है। इससे साफ प्रतीत होता है कि शासन के लिखित आदेशों की तुलना में स्थानीय स्तर की मनमानी अधिक प्रभावी साबित हो रही है।

प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार इस संबंध में की गई शिकायत पर महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषद, छत्तीसगढ़ ने 23 जून 2026 को शिकायत का निराकरण करते हुए जिला पंचायत कबीरधाम से प्राप्त प्रतिवेदन की जानकारी भेजी है। परिषद ने स्पष्ट रूप से बताया कि मामले में जिला पंचायत से प्रतिवेदन मंगाया गया तथा उसी के आधार पर वस्तुस्थिति से अवगत कराया गया।

जिला पंचायत का पत्र क्रमांक – 458/जि.पं./MGNREGA/स्था./2026-27 कबीरधाम दिनांक – 22/06/2026 के द्वारा जिले के समस्त पंचायतो को निर्देशित किया गया की मनरेगा योजनान्तर्गत नियुक्त संविदा एवं मानदेय अधिकारियों एवं कर्मचारियों से योजना के अतिरिक्त अन्य कार्यो का प्रभार नही दिया जावे। उक्त निर्देशो का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करे। लेकिन जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों ने जिला पंचायत के निर्देशो का कड़ाई से पालन नही किया, अवहेलना की जा रही है।

“या यूं कहे की सिर्फ पत्राचार कर कागज – कागज खेल रहे है”

 

इससे पहले जिला पंचायत कबीरधाम के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने दिनांक – 22 जून 2026 को आयुक्त, महात्मा गांधी नरेगा को भेजे पत्र में उल्लेख किया कि योजना अंतर्गत नियुक्त संविदा एवं मानदेय अधिकारियों-कर्मचारियों से योजना के अतिरिक्त अन्य कार्य नहीं लिए जाने संबंधी शिकायत प्राप्त हुई थी। इतना ही नहीं, पत्र में यह भी स्वीकार किया गया कि पूर्व में भी सभी जनपद पंचायतों को इस संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी किए जा चुके हैं तथा उनका कड़ाई से पालन करने के आदेश दिए गए थे।

 

यानी जिला पंचायत स्वयं यह मान रही है कि मनरेगा कर्मचारियों से अतिरिक्त कार्य लेना नियमों के अनुरूप नहीं है। इसके बावजूद सहसपुर लोहारा जनपद पंचायत में तकनीकी सहायक से उपयंत्री का कार्य लिया जा रहा है। यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि शासन के आदेशों का पालन ही नहीं होना है तो फिर ऐसे आदेश जारी करने का औचित्य क्या रह जाता है।

प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि मनरेगा के तकनीकी सहायक की नियुक्ति विशेष उद्देश्य और निर्धारित कार्यों के लिए होती है। उन्हें दूसरे पद की जिम्मेदारी सौंपना न केवल सेवा शर्तों के विपरीत है, बल्कि इससे योजना के मूल कार्य भी प्रभावित होते हैं। इससे वित्तीय, तकनीकी और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

 

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शिकायत मुख्यमंत्री जनदर्शन, सीपीजीआरएएमएस और राज्य स्तर तक पहुंचने के बाद भी व्यवस्था में कोई ठोस बदलाव दिखाई नहीं दे रहा। यदि शिकायतों और शासन के निर्देशों के बावजूद स्थानीय अधिकारी अपनी सुविधा के अनुसार नियमों की व्याख्या करेंगे, तो फिर शासन की मंशा और प्रशासनिक अनुशासन दोनों पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

 

अब यह मामला केवल तकनीकी सहायक से अतिरिक्त कार्य लेने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह शासन के आदेशों की विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। यदि नियमों का पालन कराने वाले अधिकारी ही नियमों की अनदेखी करेंगे, तो अधीनस्थ कर्मचारियों से अनुशासन की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

जिले में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज है कि आखिर शासन के स्पष्ट आदेशों के बावजूद अतिरिक्त कार्य किसके निर्देश पर कराया जा रहा है। यदि वास्तव में उपयंत्री का पद रिक्त है तो शासन से नियमित व्यवस्था की मांग की जानी चाहिए थी, लेकिन नियमों को दरकिनार कर तकनीकी सहायक से उपयंत्री का कार्य लेना कई संदेहों को जन्म देता है।

 

 

जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा के प्रभारी मुख्य कार्यपालन अधिकारी शिव कुमार साहू का कहना है, “हमारे यहां उपयंत्री की कमी है, जिसके चलते तकनीकी सहायक से कार्य लिया जा रहा है।”

 

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—जब शासन के स्पष्ट आदेश कहते हैं कि मनरेगा के संविदा एवं मानदेय कर्मचारियों से योजना के अतिरिक्त अन्य कार्य नहीं लिया जाएगा, तो बड़ा कौन है—शासन का नियम या प्रभारी सीईओ का आदेश।

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