व्यवस्था बदली, वक्त बदला… लेकिन 84 गांवों और राजपरिवार का रिश्ता आज भी कायम
राजमाता का आशीर्वाद लेकर निकले राजा खड्ग राज कुमार सिंह, पूर्वजों द्वारा स्थापित मंदिरों में किए दर्शन; रावण दहन के बाद सजा पारंपरिक राजदरबार, सैकड़ों लोगों ने की भेंट

सहसपुर लोहारा। समय बदला, व्यवस्थाएं बदलीं, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन सहसपुर लोहारा राजपरिवार और क्षेत्र के 84 गांवों के बीच पीढ़ियों से चला आ रहा आत्मीय रिश्ता आज भी उसी मजबूती से कायम है। विजयादशमी के अवसर पर आयोजित पारंपरिक दशहरा उत्सव में एक बार फिर इस ऐतिहासिक रिश्ते और क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की जीवंत झलक देखने को मिली।

दशहरा की वर्षों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए राजा खड्ग राज कुमार सिंह ने सर्वप्रथम राजमाता का आशीर्वाद लिया और इसके बाद राजमहल से नगर भ्रमण के लिए प्रस्थान किया। रास्ते में क्षेत्रवासियों से भेंट-मुलाकात हुई और लोगों ने आत्मीयता के साथ उनका स्वागत किया।
नगर भ्रमण के दौरान राजा ने अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित श्रीराम मंदिर, लक्ष्मी मंदिर, राधा-कृष्ण मंदिर और शीतला माता मंदिर में दर्शन-पूजन किया तथा क्षेत्र के 84 गांवों की सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की।
इसके पश्चात दशहरा मैदान में बड़ी संख्या में उपस्थित जनसमूह के बीच परंपरागत रूप से रावण दहन किया गया।
रावण दहन के बाद राजा राजपरिवार की कुलदेवी मां काली कंकालिन दाई के दरबार पहुंचे और दर्शन कर आशीर्वाद लिया। इसके पश्चात श्रीराम मंदिर में आरती कर धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण किए गए।
राजमहल वापसी पर दशहरा की एक और भावपूर्ण परंपरा निभाई गई। राजमाता एवं राजपरिवार के सदस्यों ने राजा की आरती उतारकर उनका स्वागत किया।
इसके बाद राजमहल में वर्षों पुरानी परंपरा के अनुरूप राजदरबार सजा। क्षेत्र के विभिन्न गांवों से पहुंचे सैकड़ों लोगों ने राजा से भेंट कर विजयादशमी की शुभकामनाएं दीं। राजा ने भी लोगों से आत्मीयता के साथ मुलाकात की और परंपरा के अनुसार प्रत्येक आगंतुक को पान भेंट किया।
राजमहल में सजे इस दरबार में न कोई दूरी दिखाई दी और न ही औपचारिकता। बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी उस रिश्ते की गवाही देती रही, जिसकी नींव पूर्वजों ने पीढ़ियों पहले रखी थी।
राजतंत्र इतिहास का हिस्सा बन चुका है, लेकिन उससे जुड़े सामाजिक और आत्मीय रिश्ते आज भी जीवित हैं। सहसपुर लोहारा का दशहरा इसी विरासत का प्रतीक है, जहां राजा और प्रजा का पुराना संबोधन आज शासन व्यवस्था का नहीं, बल्कि सम्मान, परंपरा, विश्वास और अपनत्व के रिश्ते का प्रतीक बन चुका है।
दशहरा का यह आयोजन केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है। यह पूर्वजों की विरासत को याद करने, अपनी संस्कृति को सहेजने और 84 गांवों के साथ पीढ़ियों पुराने रिश्ते को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का पर्व है।
यही कारण है कि बदलते दौर में भी सहसपुर लोहारा की यह परंपरा आज भी लोगों को राजमहल से जोड़ती है और यह संदेश देती है—
“व्यवस्था बदली है, लेकिन रिश्ता नहीं; पीढ़ियां बदली हैं, लेकिन अपनापन आज भी वही है।”


