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395 मजदूर कागजों में, मैदान में जेसीबी का खेल! बबई के मनरेगा तालाब कार्य ने खोली व्यवस्था की पोल, सहसपुर लोहारा में निगरानी व्यवस्था ध्वस्त

कवर्धा। जिले में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का उद्देश्य ग्रामीण गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराना और श्रम आधारित विकास कार्यों को बढ़ावा देना है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट दिखाई दे रही है। जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा अंतर्गत ग्राम पंचायत बबई में संचालित एक मनरेगा कार्य ने योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां सामुदायिक मत्स्य पालन हेतु सरगा तालाब के नवीनीकरण कार्य में कथित रूप से 395 मजदूरों के लिए मस्टररोल जारी किया गया है, लेकिन कार्यस्थल पर मजदूरों की मौजूदगी नगण्य बताई जा रही है। स्थानीय स्तर पर आरोप है कि जहां मजदूरों से कार्य कराया जाना था, वहां जेसीबी मशीनों के माध्यम से खुदाई कराई गई है।

      

प्राप्त जानकारी के अनुसार कार्य कोड 3302003039/WH/1111586212 के तहत ग्राम पंचायत बबई में तालाब नवीनीकरण का कार्य स्वीकृत है। मनरेगा के स्पष्ट प्रावधानों के अनुसार ऐसे कार्य श्रम प्रधान होने चाहिए और मशीनों के उपयोग पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद कार्यस्थल पर मजदूरों के बजाय मशीनों के उपयोग की चर्चा ग्रामीणों और क्षेत्रवासियों के बीच जोरों पर है। यदि यह आरोप सत्य पाए जाते हैं तो यह न केवल मनरेगा दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन होगा, बल्कि ग्रामीण मजदूरों के रोजगार के अधिकार पर भी सीधा प्रहार माना जाएगा

ग्रामीणों का कहना है कि रिकॉर्ड में बड़ी संख्या में मजदूरों के नाम दर्ज किए गए हैं, लेकिन कार्यस्थल पर वास्तविक स्थिति इससे मेल नहीं खाती। सवाल यह उठता है कि यदि 395 मजदूर कार्यरत थे तो मौके पर उनकी उपस्थिति क्यों नहीं दिखाई दी? क्या मस्टररोल केवल कागजों में भरा गया? क्या मजदूरी भुगतान की प्रक्रिया वास्तविक कार्य के बिना पूरी की जा रही है ।ऐसे अनेक प्रश्न अब प्रशासन के सामने खड़े हो गए हैं।

मामले को और गंभीर बनाती है ।

कार्यस्थल पर नागरिक सूचना पटल का नहीं होना। मनरेगा के प्रत्येक कार्यस्थल पर सूचना पटल लगाना अनिवार्य है, जिसमें स्वीकृत लागत, कार्य का नाम, कार्य अवधि, मजदूरों की संख्या, तकनीकी स्वीकृति सहित अन्य महत्वपूर्ण जानकारी अंकित रहती है। लेकिन बबई के इस कार्यस्थल पर सूचना पटल नहीं लगाए जाने की बात सामने आ रही है। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है।

सूचना पटल नहीं होने से ग्रामीणों और आम नागरिकों को यह जानने का अवसर ही नहीं मिलता कि कार्य किस मद से, कितनी राशि में और किन शर्तों पर कराया जा रहा है।

जानकारों का कहना है कि मनरेगा में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सूचना पटल सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था मानी जाती है। इसके अभाव में अनियमितताओं की आशंका और बढ़ जाती है। यही कारण है कि बबई का यह मामला अब केवल एक पंचायत तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि पूरे जिले में मनरेगा कार्यों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा में वर्तमान में नियमित कार्यक्रम अधिकारी पदस्थ नहीं हैं। जानकारी के अनुसार इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का प्रभार एक प्रोग्रामर को दिया गया है। मनरेगा जैसी विशाल योजना के संचालन में कार्यक्रम अधिकारी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वह फील्ड निरीक्षण, कार्यों की निगरानी, शिकायतों का निराकरण और नियमों के पालन की जिम्मेदारी निभाता है।

लेकिन स्थानीय स्तर पर आरोप लग रहे हैं कि प्रभार व्यवस्था के कारण प्रभावी निगरानी नहीं हो पा रही है। क्षेत्र में चर्चा है कि कार्यालय आधारित कार्यशैली के कारण फील्ड स्तर पर निरीक्षण लगभग नगण्य है। परिणामस्वरूप स्थानीय अमला बेलगाम होता जा रहा है और नियम-कायदों को ताक पर रखकर कार्य किए जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।

 

बबई का मामला यह भी दर्शाता है कि यदि निगरानी तंत्र कमजोर हो जाए तो योजना का मूल उद्देश्य प्रभावित होना तय है। मनरेगा का मकसद ग्रामीण गरीबों को रोजगार देना है, लेकिन यदि मशीनों से कार्य कराया जाएगा तो मजदूरों को रोजगार कहां मिलेगा? यदि मस्टररोल और वास्तविक कार्य में अंतर पाया जाता है तो यह वित्तीय अनियमितता का गंभीर मामला भी बन सकता है।

 

ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। कार्यस्थल पर जारी मस्टररोल, उपस्थिति पंजी, माप पुस्तिका, तकनीकी स्वीकृति, भुगतान विवरण तथा मशीनों के उपयोग संबंधी तथ्यों की विस्तृत जांच की जाए। साथ ही यह भी सत्यापित किया जाए कि जिन मजदूरों के नाम मस्टररोल में दर्ज हैं, उन्होंने वास्तव में कार्य किया है अथवा नहीं।

 

जिले में लगातार सामने आ रही मनरेगा संबंधी शिकायतों को देखते हुए अब यह मांग भी उठने लगी है कि कबीरधाम जिले के विभिन्न पंचायतों में संचालित मनरेगा कार्यों की जिला स्तरीय विशेष जांच टीम गठित कर व्यापक जांच कराई जाए। यदि समय रहते ऐसे मामलों पर कार्रवाई नहीं हुई तो योजना की विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

 

बबई का यह मामला केवल एक तालाब नवीनीकरण कार्य का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक व्यवस्था का आईना है जिसमें निगरानी कमजोर पड़ते ही नियमों की जगह मनमानी हावी होने लगती है। अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन और मनरेगा विभाग पर टिकी हैं कि वे इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और दोषियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई करते हैं।

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